दुर्ग में दो माताओं का अलौकिक मिलन, 49 साल पुरानी परंपरा ने श्रद्धालुओं की आंखें की नम,शनिचरी बाजार चौक में शंखध्वनि, ढोल-नगाड़ों और जयकारों के बीच हुआ भव्य मिलन, पुष्पवर्षा और महाआरती से भक्तिमय हुआ माहौल
दुर्ग/शारदीय नवरात्रि के पावन अवसर पर दुर्ग शहर में आस्था, श्रद्धा और परंपरा का अद्भुत संगम देखने को मिला। श्री गंजपारा दुर्गा उत्सव समिति और श्री सत्तीचौरा मां दुर्गा मंदिर समिति की दोनों दुर्गा प्रतिमाओं का भव्य एवं भावपूर्ण मिलन संपन्न हुआ। करीब 49 वर्षों से चली आ रही इस परंपरा के साक्षी सैकड़ों श्रद्धालु बने। दोनों माताओं के मिलन के दौरान पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया और श्रद्धालुओं ने जयकारों के साथ अपनी आस्था प्रकट की।
49 वर्षों से निभाई जा रही है अनूठी परंपरा
गंजपारा के बुजुर्गों के अनुसार, पहले गंजमंडी में स्थापित होने वाली मां दुर्गा की प्रतिमा के साथ दूसरी प्रतिमा भी विराजमान होती थी। दोनों माताओं को बहनों के स्वरूप में माना जाता है। बाद में अलग-अलग समितियों का गठन हुआ, लेकिन दोनों माताओं के मिलन की परंपरा आज भी उसी श्रद्धा और विश्वास के साथ निभाई जा रही है।
परंपरा के अनुसार, प्रतिमाओं को पंडाल में विराजमान करने से पहले एक-दूसरे के आमने-सामने से होकर गुजारा जाता है। समिति के बुजुर्गों का मानना है कि दोनों माताओं के एक-दूसरे को देख लेने के बाद ही उन्हें पंडाल में विराजमान किया जाता है। उनके अनुसार, कई अवसरों पर इस परंपरा से जुड़े ऐसे अनुभव भी सामने आए हैं, जिन्हें श्रद्धालु मां की कृपा और आस्था से जोड़कर देखते हैं।
शंखध्वनि, ढोल-नगाड़ों और पुष्पवर्षा से हुआ स्वागत
शनिचरी बाजार चौक पर जब दोनों समितियों का कारवां आमने-सामने पहुंचा, तो शंखध्वनि, ढोल-नगाड़ों की थाप और 'जय माता दी' के गगनभेदी जयकारों से पूरा क्षेत्र गूंज उठा। दोनों ओर से पुष्पवर्षा कर माताओं का स्वागत किया गया। जिले के विद्वान आचार्यों ने गंगा आरती की शैली में दोनों माताओं की महाआरती उतारी। इस दौरान 'अंबे तू है जगदम्बे काली' की आरती संगीत के साथ प्रस्तुत की गई।
इस ऐतिहासिक और भावुक क्षण को देखने के लिए सड़क के दोनों ओर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। भक्तों ने माता के जयकारे लगाए और इस मिलन को अपनी आस्था से जुड़ा विशेष अवसर बताया।
आस्था, सौहार्द और साझा संस्कृति का प्रतीक
दोनों समितियों के मनोज शर्मा एवं विकास पुरोहित ने बताया कि यह केवल दो दुर्गा प्रतिमाओं का मिलन नहीं, बल्कि दो क्षेत्रों की साझा संस्कृति, आपसी सौहार्द और अटूट आस्था का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि यह परंपरा वर्षों से श्रद्धा और प्रेम के साथ निभाई जा रही है और आगे भी इसे इसी भावना के साथ जारी रखा जाएगा।
समिति के सदस्यों ने इस अवसर को मां भगवती की कृपा से जुड़ा बताते हुए कहा कि दोनों माताओं का मिलन श्रद्धालुओं के लिए भावनात्मक और आध्यात्मिक अनुभव है। इस दौरान वातावरण में भक्ति, वात्सल्य और अपनत्व की भावना देखने को मिली।
ममता और भक्ति के भावों से सराबोर हुआ माहौल
दोनों माताओं के मिलन के दौरान श्रद्धालुओं के बीच भावुकता और उत्साह का अनूठा संगम दिखाई दिया। भक्तों ने इस पल को यादगार बताते हुए मां दुर्गा के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त की। आयोजन ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि धार्मिक परंपराएं समाज को जोड़ने, आपसी सद्भाव बढ़ाने और सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
इस भावपूर्ण अवसर पर श्रद्धालुओं की भावनाओं को इन पंक्तियों ने अभिव्यक्त किया—
ममता की मूरत से जब ममता का मिलन होता है,
धरती तो क्या, उस पल अंबर भी मगन होता है।
दुआएं खुद-ब-खुद हाथों से बरसने लगती हैं,
जब दो माताओं का यह अलौकिक संगम होता है।
कार्यक्रम में ये रहे उपस्थित
इस अवसर पर अरुण वोरा, राजेन्द्र साहू, धीरज बाकलीवाल, चतुर्भुज राठी, अशोक राठी, अजय शर्मा, गौतम जैन, गोपाल शर्मा, नवल अग्रवाल, महेश टावरी, शैलेश तिवारी, रवि पीडियार, राजेश शर्मा, सुरेश गुप्ता, नरेंद्र गुप्ता, घनश्याम पंड्या, नरेंद्र शर्मा, विजय जैन, गुड्डू कश्यप, डब्बू चंद्रवंशी, अमित यादव, मनीष दुबे, राहुल शर्मा, मनोज गुप्ता, ललित शर्मा, राजू पुरोहित, सतबीर शर्मा, विवेक मिश्रा, विकेश मिश्रा, राहुल दुबे, निर्मल शर्मा, लक्की अग्रवाल, ओमप्रकाश टावरी, ईशान शर्मा, अर्जित शुक्ला, लाला, विनय मिश्रा, ऋषि गुप्ता, मोहित पुरोहित, हर्षद पारख, सोंटी गुप्ता, कृतज्ञ शर्मा, सोनल सेन, आशीष मेश्राम, प्रकाश कश्यप, प्रवीण अग्रवाल, चेतना जैन और अनमोल पांडेय सहित सैकड़ों धर्मप्रेमी एवं समिति के सदस्य उपस्थित रहे।