हाईकोर्ट का अहम फैसला: अवैध रिश्ते को नहीं मिल सकती वैधता, पहली शादी रहते दूसरा दावा नामंजूर
बिलासपुर/ छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में उस अपील को खारिज कर दिया है, जिसमें एक महिला और उसकी दो बेटियों ने शहर के एक प्रतिष्ठित नागरिक को पति और पिता घोषित करने की मांग की थी। कोर्ट ने दो टूक कहा कि कानून के दायरे से बाहर बने रिश्तों को न्यायिक आदेश के जरिए वैध नहीं ठहराया जा सकता।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी महिला की पहली शादी विधिक रूप से अस्तित्व में है, तो उस दौरान जन्मे बच्चों को कानूनन उसी पहले पति की संतान माना जाएगा, भले ही कोई अन्य पुरुष उन्हें स्वीकार करे या महिला के साथ लंबे समय तक साथ रहे।
क्या था पूरा मामला
बिलासपुर के लिंक रोड क्षेत्र की रहने वाली दुर्गेश नंदनी और संतोषी जांगड़े ने अपनी मां चंद्रकली के साथ मिलकर फैमिली कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका में मांग की गई थी कि चंद्रकली को बृजमोहन दुआ की कानूनी पत्नी घोषित किया जाए और दोनों बेटियों को उनकी वैध संतान व उत्तराधिकारी माना जाए।
पहली शादी मौजूद, फिर भी दूसरा रिश्ता
चंद्रकली ने अदालत को बताया कि उनकी पहली शादी वर्ष 1960 में आत्मप्रकाश से हुई थी। उनका कहना था कि पति आध्यात्मिक प्रवृत्ति का था और 1984 में घर छोड़कर चला गया। इस बीच वर्ष 1971 में उन्होंने बृजमोहन दुआ के साथ वरमाला डालकर विवाह कर लिया और दोनों पति-पत्नी की तरह रहने लगे।
प्रकरण में बृजमोहन दुआ ने फैमिली कोर्ट में यह स्वीकार किया था कि चंद्रकली उनकी पत्नी हैं और दोनों बेटियां उनकी संतान हैं।
फैमिली कोर्ट ने खारिज किया था दावा
फैमिली कोर्ट ने इस मामले को संपत्ति विवाद से जुड़ा मानते हुए वर्ष 2019 में महिलाओं का परिवाद खारिज कर दिया था। कोर्ट ने कहा था कि दस्तावेज़ी साक्ष्य और कानूनी प्रावधान इस दावे का समर्थन नहीं करते।
फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती
हाईकोर्ट ने लगाई फैमिली कोर्ट के फैसले पर मुहर
हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को सही ठहराते हुए अपील खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि केवल आपसी सहमति, साथ रहने या स्वीकारोक्ति के आधार पर वैधानिक प्रावधानों को दरकिनार नहीं किया जा सकता।
फैसले के बाद अब अपीलकर्ताओं को बृजमोहन दुआ की संपत्ति या नाम से किसी भी तरह का कानूनी अधिकार नहीं मिल सकेगा। पहली शादी कभी विधिक रूप से समाप्त नहीं हुई
हाईकोर्ट ने पाया कि चंद्रकली की पहली शादी 1960 में हुई थी और वह कभी कानूनी रूप से समाप्त नहीं हुई।न तो तलाक का कोई प्रमाण पेश किया गया और न ही पहले पति की मृत्यु का कोई साक्ष्य उपलब्ध कराया गया।ऐसी स्थिति में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 5 और 11 के तहत दूसरा विवाह शून्य और अमान्य माना जाएगा।
सरकारी दस्तावेजों ने खोली पोल
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि आधार कार्ड और अन्य सरकारी रिकॉर्ड में आज भी बेटियों के पिता के रूप में आत्मप्रकाश का ही नाम दर्ज है। इससे यह स्पष्ट होता है कि दूसरे विवाह को कभी भी कानूनी मान्यता नहीं मिली।
पितृत्व पर कोर्ट की स्पष्ट राय
हाईकोर्ट ने कहा कि कानून यह मानता है कि विवाह के दौरान जन्मे बच्चे उसी पुरुष के माने जाएंगे, जिससे महिला की वैध शादी हुई हो। केवल किसी पुरुष के स्वीकार कर लेने से कानून नहीं बदलता।
पत्नी और बेटी का दर्जा देने से इनकार
जस्टिस रजनी दुबे और जस्टिस ए.के. प्रसाद की डिवीजन बेंच ने साफ कहा कि:चंद्रकली को बृजमोहन दुआ की पत्नी घोषित नहीं किया जा सकता।दुर्गेश नंदनी और संतोषी जांगड़े को उनकी बेटियां या उत्तराधिकारी नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने टिप्पणी की कि कानून के खिलाफ बने रिश्ते न्यायिक आदेश से वैध नहीं बनाए जा सकते।